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Saturday, August 21, 2010

पत्थर हूँ न ...

पत्थर हूँ ना
खण्ड- खण्ड
होना मंजूर
पर पिघलना
मंजूर नहीं

स्थिर , अटल
रहना मंजूर
पर श्वास , गति
लय मंजूर नहीं

पत्थर हूँ न
पत्थर - सा
ही रहूँगा
अच्छा है
पत्थर हूँ
कम से कम
किसी दर्द
आस , विश्वास
का अहसास
तो नहीं
कहीं कोई
जज़्बात तो नहीं
किसी गम में
डूबा तो नहीं
किसी के लिए
रोया तो नहीं
किसी को धोखा
दिया तो नहीं

अच्छा है
पत्थर हूँ
वरना
मानव
बन गया होता
और स्पन्दनहीन बन
मानव का ही
रक्त चूस गया होता

अच्छा है
पत्थर हूँ
जब स्पन्दनहीन
ही बनना है
संवेदनहीन
ही रहना है
मानवीयता से
बचना है
अपनों पर ही
शब्दों के
पत्थरों से
वार करना है
मानव बनकर भी
पत्थर ही
बनना है
तो फिर
अच्छा है
पत्थर हूँ मैं

- वंदना गुप्ता
vandana-zindagi.blogspot.com

Sunday, July 25, 2010

इसे क्या नाम दूं ...?

भोर की


सुरमई

लालिमा सी

मुस्काती

थी वो

नभ में

विचरण

करते

उन्मुक्त

खगों सी

खिलखिलाती

थी वो

और सांझ के

सिंदूरी रंग के

झुरमुट में

सो जाती

थी वो

वो थी

उसकी

पावन

निश्छल

मधुर

मनभावन

मुस्कान

हाँ --एक नवजात

शिशु की

अबोध

चित्ताकर्षक

पवित्र मुस्कान


- वंदना गुप्ता

vandana-zindagi.blogspot.com