तुम भी चुप थे और मिरे लब भी न हिल सके
आंखों ने इसी बीच में कुछ गुफ्तगू कर ली ।।
किधर को जायेंगे अहल - ऐ - सफ़र नहीं मालूम
वो बदहवासी है अपना ही घर नहीं मालूम
मेरे खुदा मुझे तौकीद दे मोहब्बत की
दिलों को जीतने वाला हुनर नहीं मालूम
हम अपने घर में भी महफूज़ रह नहीं सकते
के हमको नीयत - ऐ - दीवार - ओ - दर नहीं मालूम
हमेशा टूट के माँ बाप की करो खिदमत
हैं कितने रोज़ ये बूढ़े सज़र नहीं मालूम
- मंज़र भोपाली
हमारी जेब से जब भी कलम निकलता है
सियाह शब् के यजीदों का दम निकलता है
तुम्हारे वादों का कद भी तुम्हारे जैसा है
कभी जो नाप के देखो तो कम निकलता है
ये इत्तेफ्फाक है मंज़र या कोई साज़िश है
हमेशा क्यूँ मेरे घर से ही बम निकलता है
- मंज़र भोपाली
वो बदहवासी है, अपना ही घर नहीं मालूम
- मंज़र भोपाली